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आज के युवा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जानते तक नहीं: सुरेन जालान का सवाल – 6 जुलाई को छुट्टी के साथ मिले सम्मान

आसनसोल। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती 6 जुलाई के मौके पर शहर के विशिष्ट व्यवसायी सुरेन जालान ने इस महान देशभक्त को याद करते हुए सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं।

“भारत माता के वीर पुत्र को भूल गई सरकार”
सुरेन जालान ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बंगाल के जाने-माने शिक्षाविद और न्यायाधीश थे। डॉ. मुखर्जी खुद एक महान शिक्षाविद, बैरिस्टर और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नातक, बांग्ला में MA और कानून की डिग्री ली। 1927 में इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर लौटे। मात्र 33 साल की उम्र में 1934 में वे दुनिया के सबसे युवा कुलपति बनकर कलकत्ता विश्वविद्यालय के Vice-Chancellor बने। 1929 में बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे।

आजादी के बाद पंडित नेहरू के आमंत्रण पर वे स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने। लेकिन नेहरू-लियाकत समझौते से मतभेद के कारण 1950 में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 21 अक्टूबर 1951 को RSS की मदद से ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की, जो आगे चलकर आज की भाजपा बनी।

“कश्मीर के लिए प्राण दे दिए, पर याद कौन करता है?”
श्री जालान ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का सपना था जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण अभिन्न अंग बनाना। अनुच्छेद 370 का विरोध करते हुए उन्होंने नारा दिया था – “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे”। 1953 में बिना परमिट जम्मू-कश्मीर जाने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 23 जून 1953 को श्रीनगर जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।

एक दक्ष राजनीतिज्ञ, विद्वान और स्पष्टवादी के रूप में वे अपने मित्रों और शत्रुओं से समान रूप से सम्मानित थे। एक महान देशभक्त और संसद शिरोमणि के रूप में भारत उन्हें सम्मान से याद करता है।

“युवा पीढ़ी अनजान, सरकार मौन क्यों?”
लेकिन सुरेन जालान का दर्द सबसे बड़ा यही है कि आज के युवा पीढ़ी जानती तक नहीं कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कौन थे। उन्होंने सवाल किया कि इतने दिनों से ऐसे महान दक्ष राजनीतिज्ञ, विद्वान और देशभक्त के बारे में सरकार ने लोगों को क्यों नहीं बताया?

“6 जुलाई को छुट्टी तो दे दी जाती है, लेकिन स्कूल-कॉलेज में बच्चों को उनके बलिदान और विचारों के बारे में कौन पढ़ाता है? जिस व्यक्ति ने कश्मीर को भारत से जोड़ने के लिए अपनी जान दे दी, उनके नाम पर सरकारी स्तर पर बड़े कार्यक्रम, सेमिनार, चर्चा क्यों नहीं होती?” श्री जालान ने कहा।

उन्होंने मांग की कि सरकार डॉ. मुखर्जी के जीवन और विचारों को पाठ्यक्रम में शामिल करे, ताकि आने वाली पीढ़ी अपने इस वीर सपूत को पहचान सके और उनसे प्रेरणा ले सके।

 

  

        

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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