सेवानिवृत्ति के बाद क्वार्टर खाली नहीं किया तो ग्रेच्युटी से कटेगा किराया’: उच्च न्यायालय ने ईसीएल के पक्ष में सुनाया सख्त फैसला, अनधिकृत कब्जाधारियों को बड़ा झटका
कुल्टी । पूर्वी कोयला क्षेत्र लिमिटेड (ईसीएल) के आवासों पर सेवानिवृत्ति के बाद भी जमे पूर्व कर्मचारियों को कलकत्ता उच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। माननीय उच्च न्यायालय ने ईसीएल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए साफ किया कि अनधिकृत कब्जाधारियों को किराया देना होगा और कंपनी इस रकम को उनकी ग्रेच्युटी से काट सकती है।
9 अप्रैल को आया था फैसला
माननीय कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 9 अप्रैल 2026 को याचिका संख्या 7593 वर्ष 2026, याचिका संख्या 7595 वर्ष 2026 तथा याचिका संख्या 7598 वर्ष 2026 (पूर्वी कोयला क्षेत्र लिमिटेड बनाम भारत संघ एवं अन्य) मामलों में यह स्पष्ट और ठोस निर्णय दिया। ये सभी मामले ईसीएल मुख्यालय के पूर्व कर्मचारियों से जुड़े थे।
क्या कहा न्यायालय ने?
1. किराया देना होगा: कंपनी के आवास पर अनधिकृत कब्जा करने वालों को बाजार दर से किराया अदा करना होगा।
2. ग्रेच्युटी से वसूली: यह बकाया राशि ‘सरकारी देयता’ मानी जाएगी और ईसीएल इसे कर्मचारी की ग्रेच्युटी से काट सकती है।
3. 15 दिन में हिसाब: क्वार्टर खाली करने के बाद बकाया किराया काटकर शेष ग्रेच्युटी राशि 15 दिनों के भीतर पूर्व कर्मचारी को देनी होगी।
कोल इंडिया की नीति के अनुरूप फैसला
यह निर्णय कोल इंडिया लिमिटेड के 11 नवंबर 2021 के परिपत्र संख्या सीआईएल:डी(पीएंडआईआर):एसईसीएच:005:144:133 के अनुरूप है, जिसमें सभी अनुषंगी कंपनियों को सेवानिवृत्ति के बाद क्वार्टर समय पर खाली कराने के निर्देश दिए गए थे। न्यायालय ने 1 अप्रैल 2026 को दिए गए पूर्व निर्देशों को भी बरकरार रखा है।
‘सेवारत कर्मचारियों के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं’
माननीय न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ऐसे अनधिकृत कब्जे को सहन किया गया तो अन्य लोग भी प्रोत्साहित होंगे। इसका सीधा नुकसान उन हजारों सेवारत कर्मचारियों को होगा जो कठिन खनन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और क्वार्टर मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
ईसीएल ने किया स्वागत
पूर्वी कोयला क्षेत्र लिमिटेड ने उच्च न्यायालय के इस फैसले का स्वागत किया है। कंपनी का कहना है कि हर कंपनी आवास एक सेवारत कर्मचारी और उसके परिवार का घर है। सेवानिवृत्ति के बाद कब्जा बनाए रखना सीधे तौर पर ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों के अधिकार का हनन है।
यह फैसला सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग पर रोक और कंपनी आवासों के आवंटन में अनुशासन व निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।












