सहयोग ने किया समकालीन साहित्य और चुनौतिया विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
वरिष्ठ लेखिका निर्मला तोदी को बजरंग स्मृति साहित्य सम्मान तथा युवा लेखिका एकता मंडल को मिला सुरेंद्र साहित्य सम्मान
आसनसोल । सहयोग (साहित्य एवं संस्कृति का विशिष्ट आयोजन) संस्था के तत्वावधान में साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में ‘समकालीन साहित्य और चुनौतियाँ’ विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन गुजराती भवन में किया गया। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध आलोचक एवं संपादक शंभुनाथ ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज के दौर में मनुष्य और साहित्य का अस्तित्व तभी सुरक्षित रह सकता है, जब सृजनात्मकता, कल्पना और उदारता जीवित रहें। और ये तीनों मूल्य तभी सुरक्षित रह सकते हैं, जब साहित्य जीवित रहेगा। साहित्य ही मनुष्य के भीतर सृजनात्मक चेतना, कल्पनाशीलता और उदार दृष्टि को विकसित करता है। उन्होंने कहा कि आज आसनसोल की धरती पर निर्मला तोदी और एकता मंडल जैसी रचनाकारों को सम्मानित किया जाना उसी सृजनशील परंपरा को बचाने और आगे बढ़ाने का सार्थक प्रयास है।
इसी क्रम में सहयोग संस्था द्वारा साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2025 का वरिष्ठ सम्मान ‘बजरंग स्मृति साहित्य सम्मान’ वरिष्ठ लेखिका निर्मला तोदी को तथा युवा वर्ग का ‘सुरेंद्र साहित्य सम्मान’ युवा लेखिका एकता मंडल को प्रदान किया गया। एकता मंडल के साहित्यिक कृतित्व पर आरती कुमारी ने विचारपूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया, वहीं डॉ. संयोगिता वर्मा ने निर्मला तोदी की कहानियों पर सारगर्भित और आलोचनात्मक वक्तव्य रखा। संगोष्ठी के प्रथम सत्र का संचालन ललिता महतो ने किया।
स्वागत भाषण नीतू निशा ने प्रस्तुत किया। संस्था के सचिव दिनेश कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि उनके दादा बजरंगलाल समानता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रबल पक्षधर थे। औपचारिक शिक्षा सीमित होने के बावजूद वे शिक्षा के महत्व को गहराई से समझते थे। उनके पिता सुरेंद्र प्रसाद को वे सदा प्रेम और स्नेह के साथ स्मरण करते हैं। दोनों ही शिक्षा और संस्कृति से गहरे जुड़े हुए थे तथा समाज की उन्नति को ही अपना लक्ष्य मानते थे। यह आयोजन उनके सपनों को साकार करने की दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए मनोहर भाई पटेल ने सभी को उत्साहित करते हुए कहा कि भविष्य में भी ऐसे साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों की निरंतरता बनी रहेगी। संगोष्ठी के दूसरे सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कहानीकार महावीर राजी ने की। उन्होंने साहित्य के समक्ष उपस्थित चुनौतियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि आने वाला समय अत्यंत कठिन है और साहित्यकारों को सामूहिक रूप से इन चुनौतियों का सामना करना होगा। डॉ. प्रतिमा प्रसाद ने उदय प्रकाश की कहानी ‘मेंगोसिल’ और अदम गोंडवी के संदर्भ में समकालीन समय और साहित्य की जटिल चुनौतियों को रेखांकित किया। कहानीकार सृंजय ने राजनीति से उत्पन्न खतरों की ओर संकेत करते हुए आम नागरिकों के समक्ष उपस्थित संकटों पर प्रकाश डाला।
दिल्ली से आए बनासजन पत्रिका के संपादक–आलोचक पल्लव ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि आसनसोल उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत एवं एक यादगार शहर है । आज के समय में रचना करना ही प्रतिरोध का रूप है। साहित्य को अब छोटे-छोटे केंद्रों की आवश्यकता है, जहाँ से वैचारिक संघर्ष की नई ऊर्जा उत्पन्न हो—जैसा कि आज आसनसोल की धरती कर रही है। डॉ. अरुण पांडे ने राजनीति और साहित्य के पारस्परिक संबंधों तथा उनसे जुड़ी चुनौतियों पर विचार रखे।
द्वितीय सत्र का संचालन गुलनाज बेगम ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन शिवकुमार यादव ने प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम का सफल आयोजन करने में संस्था के प्रदीप साह, बुद्धेश्वर हांसदा का भी योगदान रहा। इस आयोजन में आसनसोल, दुर्गापुर, रानीगंज और धनबाद सहित अनेक शहरों से आए रचनाकारों, बुद्धिजीवियों, आलोचकों, शिक्षकों, शोधार्थियों तथा विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के छात्रों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।













