कुल्टी का बेना गांव: जहां सन्नाटे में भी जिंदा है आस्था, वीरान खंडहरों के बीच चमक रहा है मां लक्ष्मी का मंदिर
शिल्पांचल टुडे, कुल्टी।
कुल्टी के बेना गांव की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक समय जो गांव लोगों की चहल-पहल से आबाद था, आज वहां सन्नाटा पसरा है। जर्जर मकान, टूटी दीवारें, झाड़ियों से घिरे घर और खंडहर बन चुके आंगन गांव के सुनहरे अतीत की गवाही देते हैं। लेकिन इस वीरानी के बीच आज भी एक जगह ऐसी है जहां आस्था की लौ कभी बुझी नहीं, वो है मां लक्ष्मी का मंदिर।
क्यों वीरान हुआ बेना गांव?
स्थानीय लोगों के अनुसार, एक समय बेना गांव में सैकड़ों परिवार हंसी-खुशी रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे बुनियादी सुविधाओं की कमी इस गांव के लिए अभिशाप बन गई। सड़क, बिजली, पीने के पानी और रोजगार की समस्याओं ने लोगों को पलायन पर मजबूर कर दिया।
पुरानी रिपोर्टों की मानें तो 2000 के दशक के बाद गांव से पलायन तेजी से बढ़ा। बेहतर जिंदगी की तलाश में लोग आसनसोल, कुल्टी और आसपास के शहरों में बसने लगे। देखते ही देखते पूरा गांव खाली हो गया और मकान खंडहर में बदल गए।
वीरान होने और कई लोककथाओं के चलते लोग इसे ‘भूतों का गांव’ भी कहने लगे, हालांकि इन कहानियों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
लक्ष्मी पूजा पर फिर से जी उठता है गांव
बेना की सबसे भावुक करने वाली बात यह है कि गांव छोड़ चुके लोगों ने अपनी मिट्टी से नाता नहीं तोड़ा। साल भर गांव में सन्नाटा रहता है, लेकिन कोजागरी पूर्णिमा और लक्ष्मी पूजा के आते ही यह वीरान गांव फिर से जीवंत हो उठता है।
पुराने ग्रामीण अपने परिवार के साथ अपने पैतृक गांव लौटते हैं, मंदिर की साफ-सफाई करते हैं, मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं और प्रसाद बांटते हैं। यह सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि पुराने दोस्तों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों का मिलन समारोह बन जाता है।
खंडहरों के बीच नया चमकता मंदिर
हाल ही में वीरान घरों के बीच स्थित इस लक्ष्मी मंदिर को नए सिरे से सजाया-संवारा गया है। रंग-बिरंगी टाइल्स, नई लाइटिंग और सजावट के कारण यह मंदिर आसपास के खंडहरनुमा माहौल में एक उम्मीद की तरह चमकता है। यह मंदिर आज भी बेना के अतीत और वर्तमान को जोड़े हुए है।
सच ही कहा गया है, गांव भले ही खाली हो गया, लेकिन लोगों के दिलों में आज भी बेना जिंदा है।














