हजारों की दिवाली में बस 100 रुपये की उम्मीद… मिट्टी के दीये और मिठाइयां बेचने वालों की आंखों में आज भी बाकी है त्योहार की रोशनी!
किसी के घर में जगमगाएंगी लाखों की झालरें, तो किसी की पूरी दिवाली टिकी है सड़क किनारे लगी छोटी-सी दुकान पर… क्या इस बार हम इनकी दिवाली भी रोशन करेंगे?
शिल्पांचल टुडे, आसनसोल।
दिवाली का त्योहार आते ही शहर की सड़कें रोशनी से नहा उठती हैं। बाजारों में भीड़ उमड़ पड़ती है। कहीं हजारों रुपये के कपड़ों की खरीदारी हो रही है, तो कहीं महंगे पटाखों और तरह-तरह की मिठाइयों पर पैसे खर्च किए जा रहे हैं। घरों को सजाने के लिए रंग-बिरंगी लाइटें खरीदी जा रही हैं। हर तरफ चकाचौंध है, उत्साह है और खुशियों का माहौल है।
लेकिन इसी जगमगाती दुनिया के बीच सड़क के किसी कोने में बैठा एक ऐसा तबका भी है, जिसकी दिवाली की पूरी उम्मीद कुछ छोटी-छोटी खरीदारी पर टिकी हुई है।
ये वे लोग हैं, जो महीनों की मेहनत से अपने हाथों से मिट्टी के दीये बनाते हैं। कोई मिट्टी को आकार देकर सुंदर खिलौने तैयार करता है, तो कोई रंगों से उन खिलौनों को सजाकर बाजार में बेचने की तैयारी करता है। कहीं सड़क किनारे छोटी-सी दुकान लगाकर मिट्टी के दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और सजावटी सामान बेचे जा रहे हैं, तो कहीं घर में बनाई गई पारंपरिक मिठाइयों को लेकर दुकानदार ग्राहकों के इंतजार में बैठे हैं।
इनके पास न कोई बड़ा शोरूम है, न चमचमाती दुकान, न बड़े-बड़े विज्ञापन। इनके पास है तो सिर्फ अपनी मेहनत, हाथों का हुनर और आंखों में एक छोटी-सी उम्मीद।
इनकी दिवाली का हिसाब थोड़ा अलग है…
जहां हम दिवाली के नाम पर हजारों रुपये के कपड़े खरीद लेते हैं, महंगे पटाखे जला देते हैं और मिठाइयों के डिब्बे खरीदने में भी नहीं सोचते, वहीं इन छोटे दुकानदारों के लिए आपकी 50 या 100 रुपये की खरीदारी भी किसी बड़ी खुशी से कम नहीं है।
किसी के लिए 100 रुपये शायद एक छोटी-सी रकम हो, लेकिन सड़क किनारे दीये बेच रहे उस बुजुर्ग के लिए यही 100 रुपये उसके घर में चूल्हा जलाने का सहारा बन सकते हैं। मिट्टी के खिलौने बेच रही उस महिला के लिए यही पैसे उसके बच्चों की मुस्कान बन सकते हैं। घर में पारंपरिक मिठाइयां बनाकर बेचने वाले परिवार के लिए यही खरीदारी उनकी कई दिनों की मेहनत का सम्मान हो सकती है।
जरा सोचिए…
जिस दीये को खरीदकर हम अपने घर के मंदिर में सजाते हैं, उसे बनाने वाले हाथों ने शायद कई रातें जागकर बिताई होंगी। जिस मिट्टी के खिलौने को हम अपने बच्चों के हाथ में थमाते हैं, उसे बनाने वाले कारीगर के अपने बच्चे भी शायद उसी उम्मीद में बैठे हों कि इस दिवाली कुछ अच्छी कमाई होगी।
जिस मिठाई को हम त्योहार की खुशियों में बांटते हैं, उसे बनाने वाले छोटे दुकानदार के घर में भी शायद कोई बच्चा अपने माता-पिता से नई पोशाक या मिठाई की उम्मीद लगाए बैठा हो।
लेकिन अफसोस, त्योहार की चकाचौंध में अक्सर हमारी नजरें इन छोटी दुकानों तक पहुंच ही नहीं पातीं।
आज बाजार में बिजली से जलने वाले सैकड़ों डिजाइन के दीये हैं। चीन से आने वाले सजावटी सामान और मशीनों से बने खिलौनों की भरमार है। बड़े-बड़े ब्रांड और ऑनलाइन बाजार ने छोटी दुकानों के सामने मुकाबला और मुश्किल कर दिया है। ऐसे में पारंपरिक तरीके से मिट्टी के दीये और खिलौने बनाने वाले कारीगरों के सामने अपनी मेहनत की कीमत पाने की चुनौती भी है।
फिर भी वे हर साल दिवाली आने का इंतजार करते हैं।
उन्हें उम्मीद रहती है कि इस बार ग्राहक आएंगे, उनके बनाए दीये बिकेंगे, खिलौनों की टोकरी खाली होगी और घर लौटते समय वे अपने बच्चों के लिए भी कुछ लेकर जा सकेंगे।
उनकी आंखें हर गुजरने वाले राहगीर को देखती हैं। कोई दुकान के सामने रुकता है तो चेहरे पर उम्मीद की चमक आ जाती है। कोई कीमत पूछकर आगे बढ़ जाता है, तो वह फिर भी मुस्कुराकर अगले ग्राहक का इंतजार करने लगते हैं।
सवाल सिर्फ खरीदारी का नहीं, हमारी संवेदनाओं का भी है।
दिवाली का असली अर्थ केवल अपने घर को रोशन करना नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन में भी थोड़ी रोशनी पहुंचाना है। अगर हम हजारों रुपये खर्च करने की क्षमता रखते हैं, तो क्या अपनी खरीदारी में से 100 रुपये इन मेहनतकश परिवारों के लिए नहीं निकाल सकते?
इस बार जब आप दिवाली की खरीदारी करने निकलें, तो एक बार सड़क किनारे बैठे उस कुम्हार को भी जरूर देखिएगा। उस महिला को भी देखिएगा, जो अपने हाथों से बनाए मिट्टी के खिलौने बेच रही है। उस छोटे मिठाई विक्रेता को भी देखिएगा, जिसकी दुकान भले ही छोटी हो, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े हैं।
हो सकता है आपके घर में पहले से ही दर्जनों इलेक्ट्रॉनिक लाइटें हों, लेकिन एक मिट्टी का दीया खरीदने से आपके घर की रोशनी शायद बहुत ज्यादा न बढ़े, मगर किसी गरीब कारीगर के घर में उम्मीद का एक नया दीपक जरूर जल सकता है।
हो सकता है बाजार की बड़ी मिठाई की दुकान से खरीदारी करना आपकी पसंद हो, लेकिन एक बार किसी छोटे दुकानदार से भी मिठाई खरीदकर देखिए। उसकी आंखों में मिलने वाली खुशी किसी महंगे उपहार से कम नहीं होगी।
इस दिवाली एक संकल्प लें…
कम से कम एक मिट्टी का दीया जरूर खरीदेंगे। बच्चों के लिए एक मिट्टी का खिलौना जरूर लेंगे। सड़क किनारे मेहनत से मिठाई बना रहे किसी छोटे दुकानदार से भी खरीदारी करेंगे।
क्योंकि त्योहार तभी खूबसूरत बनता है, जब उसकी खुशियां सिर्फ हमारे घर तक सीमित न रहें।
याद रखिए…
आपके घर में जलने वाला एक मिट्टी का दीया किसी गरीब परिवार के घर का चूल्हा भी जला सकता है।
इस दिवाली सिर्फ अपने घर को रोशन मत कीजिए, किसी मेहनतकश के घर में भी खुशियों की रोशनी पहुंचाइए।
क्योंकि असली दिवाली महंगे कपड़ों, पटाखों और रोशनी की नहीं, बल्कि इंसानियत, मेहनत का सम्मान और एक-दूसरे के चेहरे पर मुस्कान लाने की है।
इस दिवाली आपकी छोटी-सी खरीदारी, किसी के लिए सबसे बड़ा त्योहार बन सकती है!













