“80 साल बाद लाल किले से गूंजा ‘वंदे मातरम्’: स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज अब बनी गणतंत्र की परंपरा”
आकाश सिंह
कुल्टी। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से एक ऐतिहासिक क्षण सामने आया। पहली बार ‘वंदे मातरम्’ को लाल किले के आधिकारिक समारोह में राष्ट्रगान से पहले प्रस्तुत किया गया। संयोग से इस साल गीत की रचना को 150 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं।
लेकिन सवाल सबके मन में है — जिस गीत ने आजादी की लड़ाई में करोड़ों भारतीयों में देशभक्ति की आग जलाई, उसे लाल किले के मुख्य मंच पर आने में आठ दशक* क्यों लगे?
आंदोलन का गीत, फिर राष्ट्रीय गीत बना
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर की आवाज में गूंजा और 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह हर स्वतंत्रता सेनानी की जुबान पर था।
आजादी के बाद 1950 में भारत ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। यानी इसे सम्मान नहीं मिला, ऐसा कहना गलत होगा।
तो देरी क्यों हुई?
दरअसल विवाद गीत को लेकर नहीं, बल्कि इसके बाद के कुछ अंशों में मौजूद शब्दों और प्रतीकों को लेकर था। एक विविधतापूर्ण देश में सभी को साथ लेकर चलने की चुनौती के कारण सरकारी और औपचारिक मंचों पर इसके उपयोग में एहतियात बरती गई। इसी वजह से ये लाल किले के मुख्य समारोह का हिस्सा नहीं बन पाया।
2026 में क्या अलग हुआ?
इस वर्ष वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर इसे विशेष रूप से मनाने का फैसला लिया गया। रक्षा मंत्रालय ने पहले ही घोषणा की थी कि इस बार लाल किले पर इसका पूर्ण गायन होगा।
15 अगस्त को वैसा ही हुआ। ध्वजारोहण से पहले सैन्य बैंड और स्कूली बच्चों ने मिलकर ‘वंदे मातरम्’ प्रस्तुत किया। इसके बाद तिरंगा फहराया गया और ‘जन गण मन’ गाया गया।
क्या सिर्फ एक गीत था या संदेश भी?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल कार्यक्रम में एक नया गीत जोड़ना नहीं है। यह स्वतंत्रता संग्राम की उस भावना को फिर से राष्ट्रीय मंच पर लाना है जिसने अंग्रेजों के खिलाफ पूरे देश को एक किया था।
साथ ही यह इस बात का भी प्रतीक है कि लोकतांत्रिक भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों को इतिहास, विविधता और वर्तमान की जरूरतों के बीच संतुलित करने की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
निष्कर्ष
‘वंदे मातरम्’ को 80 साल तक “दबाया” गया, ऐसा कहना अधूरा होगा। सच ये है कि ये हमेशा राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मानित रहा और अब 2026 में इसे लाल किले के औपचारिक समारोह में जगह मिली।
लाल किले से गूंजा ‘वंदे मातरम्’ आज ये बताता है कि भारत अपनी जड़ों को भूल नहीं रहा बल्कि उन्हें नई पीढ़ी के सामने गर्व से रख रहा है।


























