सपने में मिली थी 3 शिलाएं, आज आसनसोल की रक्षक बनी घाघर बुड़ी माँ – 500 साल से पूरी हो रही हैं मन्नतें
सबिता प्रसाद
आसनसोल । पश्चिम बंगाल के आसनसोल में नुनिया नदी के किनारे स्थित “घाघर बुड़ी माँ” का मंदिर आस्था और चमत्कार की अनूठी कहानी कहता है। करीब 500 साल पुराना यह मंदिर आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
कैसे हुई माँ की स्थापना – चमत्कार की कहानी
कहते हैं 500 साल पहले आसनसोल पूरा जंगल था। इसी जंगल में छोटे-छोटे गांव बसे थे। यहीं एक ब्राह्मण विधवा कंगालिनी चक्रवर्ती अपने तीन छोटे बेटों के साथ रहती थीं। अत्यधिक गरीबी के कारण उन्हें भिक्षा मांगकर घर चलाना पड़ता था।
एक दिन भिक्षा में कुछ न मिलने पर वे नुनिया नदी के किनारे एक नीम के पेड़ के नीचे बैठकर चिंता में रोते-रोते सो गईं। तभी सपने में उन्हें एक घाघरा पहनी हुई बूढ़ी माँ दिखाई दीं। माँ ने नदी में स्नान किया और तीन पत्थर लेकर उनके पास आईं।
माँ ने कहा – “अब तुझे भिक्षा नहीं मांगनी पड़ेगी। मैं देवी चंडी हूँ। लोग मुझे घाघर बुड़ी कहते हैं। ये तीन शिलाएं ले – बीच वाली मैं घाघर बुड़ी, दाईं वाली दुर्गा और बाईं वाली शिव। इसी जगह मेरी नित्य पूजा करो, तुम्हारे परिवार का कल्याण होगा।”
यह कहकर माँ अंतर्ध्यान हो गईं। सुबह उठकर कंगालिनी ने देखा तो सच में उनके पास तीन शिलाएं रखी थीं। इसके बाद उन्होंने सिंदूर और फूलों से उन शिलाओं की पूजा शुरू की।
ब्राह्मणी के बाद बेटों ने संभाली पूजा
कंगालिनी के निधन के बाद उनके बेटे पूजा करते रहे। धीरे-धीरे उनकी गरीबी दूर हो गई। लगभग 100 साल बाद भक्तों की आस्था बढ़ने पर यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।
दो मतों से होती है पूजा
आज भी इस मंदिर में तीन मतों से नित्य पूजा होती है।
– वैष्णव मत से माँ की पूजा वैष्णवी रूप में
– शाक्त मत से माँ की पूजा चंडी रूप में की जाती है।
माँ को फूलों के गहनों से सजाया जाता है और भोग लगाया जाता है।
1 माघ को लगता है विशाल मेला
हर साल 1 माघ को यहां विशेष पूजा और विशाल मेले का आयोजन होता है। दूर-दूर से श्रद्धालु माँ के दर्शन और भोग के लिए आते हैं। उस समय नुनिया नदी का पानी भी आज की तरह गंदा नहीं था।
“जय माँ घाघर बुड़ी” के जयकारों से गूंजने वाला यह मंदिर आसनसोल की सबसे प्राचीन और चमत्कारी शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

























