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4 सितंबर को मनेगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी! गृहस्थ और वैष्णव व्रत में क्या है अंतर? पंडित हेमंत मिश्रा ने बताया निशीथ काल का शुभ मुहूर्त

पंडित हेमंत मिश्रा (ज्योतिषविद) MAJY

आसनसोल । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का यह पावन पर्व 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। उक्त बातें पंडित हेमंत मिश्रा (ज्योतिषविद) MAJY ने कही। उन्होंने भक्ति की जानकारी के लिए बताया कि
हिन्दू पंचांग और सनातन धर्म की परंपराओं के अनुसार, गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों (गृहस्थों) और सन्यासियों (वैष्णव/मठ-अड्डों से जुड़े साधु-संतों) के लिए जन्माष्टमी की तिथि और पूजन के नियम में थोड़ा अंतर होता है, जिसे विस्तार से नीचे समझा गया है:
1. गृहस्थ आश्रम के लिए जन्माष्टमी
तिथि एवं नियम: गृहस्थ जीवन वाले लोग आमतौर पर उदया तिथि या पंचांग की गणना के अनुसार उस दिन व्रत रखते हैं जिस दिन अष्टमी तिथि और निशीथ काल (मध्यरात्रि) का संयोग मुख्य रूप से मिलता है। इस वर्ष 4 सितंबर 2026 को गृहस्थों के लिए व्रत और पूजन का मुख्य दिन रहेगा।
पूजा का समय (निशीथ काल): गृहस्थों के लिए भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप (लड्डू गोपाल) के जन्मोत्सव की पूजा मध्यरात्रि (रात के समय) में की जाती है। चूंकि भगवान का जन्म रात के 12 बजे के आसपास कारागार में हुआ था, इसलिए गृहस्थ लोग रात को ठीक बारह बजे शंख-घड़ियाल बजाकर, पंचामृत से स्नान कराकर और माखन-मिश्री का भोग लगाकर अपना व्रत खोलते या पूजन संपन्न करते हैं।
पारणा (व्रतः समापन): व्रत का पारणा अगले दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद नियमों के अनुसार किया जाता है।
2. सन्यासियों और वैष्णव संप्रदाय के लिए जन्माष्टमी
तिथि एवं नियम: सन्यासी, विरक्त और वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी (विशेषकर जिनमें इस्स्कॉन या मठों से जुड़े संत आते हैं) उदया तिथि और सूर्योदय कालीन सप्तमी-अष्टमी या नक्षत्रों की स्थिति के आधार पर व्रत तय करते हैं। वैष्णव पंचांग की गणना अक्सर सूर्योदय और सप्तमी-अष्टमी के वेध को ध्यान में रखकर की जाती है।
पूजा पद्धति: सन्यासी लोग बाल गोपाल की मूर्तियों की बजाय ज्यादातर शाग्राम शिला या अपने आराध्य के रूप में बालकृष्ण की आंतरिक और मानसिक साधना के साथ-साथ विधिवत अनुष्ठान करते हैं। इनके लिए व्रत का स्वरूप पूरी तरह से निराहार, आत्म-संयम और भजन-कीर्तन पर केंद्रित होता है। कई बार वैष्णव संप्रदाय में जन्मोत्सव मुख्य तिथि के अगले दिन ‘नंदोत्सव’ के रूप में भी बड़े उल्लास से मनाया जाता है, जिसमें सन्यासी और भक्तगण आनंद-उत्सव मनाते हैं।
संक्षेप में: पंचांगीय गणना के अनुसार इस वर्ष गृहस्थ और वैष्णव दोनों के लिए मुख्य उत्सव 4 सितंबर 2026 को ही है, जिसमें रात के समय मध्यरात्रि का पूजन मुख्य रहेगा।

नोट : विशेष जानकारी के लिए इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं
MB – 9332449502

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