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अंग्रेजी हुकूमत भी नहीं रोक पाई परंपरा! बुदबुद के सोंवाई गांव में 334 साल से हो रही दुर्गापूजा, नवमी पर आज भी होती है महिष बलि

शिल्पांचल टुडे,  बुदबुद, पूर्व बर्दवान ।

पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। पूर्व बर्दवान जिले के बुदबुद थाना क्षेत्र के सोंवाई गांव में स्थित मुखर्जी बाड़ी की दुर्गापूजा इसकी एक खास मिसाल है। परिवार के अनुसार, यहां पिछले 334 वर्षों से मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। इस पूजा की सबसे चर्चित परंपरा नवमी के दिन होने वाली महिष यानी भैंस की बलि है, जो आज भी जारी है।

परिवार में प्रचलित मान्यता के अनुसार, अंग्रेजी शासन के दौरान भी इस परंपरा को रोकने की कोशिश की गई थी, लेकिन अंततः पूजा की पुरानी रीति कायम रही। हालांकि, इस घटना से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

1692 के आसपास शुरू हुई पूजा की परंपरा

मुखर्जी परिवार के सदस्यों के अनुसार, इस दुर्गापूजा की शुरुआत करीब 334 वर्ष पहले बासुदेव मुखर्जी ने की थी। परिवार की परंपरा के मुताबिक, बासुदेव मुखर्जी मूल रूप से पूर्व बर्दवान जिले के बाकलसार गांव के निवासी थे। शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह सोंवाई गांव आए थे, जहां एक पारंपरिक पाठशाला यानी टोल में पढ़ाई होती थी।

इसी दौरान उनका विवाह सोंवाई गांव में हुआ और बाद में उन्होंने यहीं बसने का फैसला किया। बाकलसार स्थित उनके पैतृक घर में पहले से मां दुर्गा की पूजा होती थी। सोंवाई में रहने के बाद भी वह अपनी आराध्य देवी की पूजा जारी रखना चाहते थे। इसी उद्देश्य से मां दुर्गा की प्रतिमा को कंधे पर लेकर सोंवाई लाने की परंपरा से जुड़ी कहानी परिवार में प्रचलित है।

बर्दवान के राजा से जुड़ी है अनोखी मान्यता

मुखर्जी परिवार में प्रचलित एक ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, जब मां दुर्गा को कंधे पर लेकर सोंवाई लाया जा रहा था, उसी दौरान बर्दवान के तत्कालीन राजा अपने सैनिकों के साथ वहां से गुजर रहे थे।

रास्ते को लेकर सैनिकों और देवी को लेकर जा रहे लोगों के बीच स्थिति उलझ गई। बताया जाता है कि इसकी जानकारी मिलने पर राजा स्वयं वहां पहुंचे। पूरी बात जानने के बाद उन्होंने मां दुर्गा को प्रणाम किया और देवी को ले जाने वाले लोगों के लिए रास्ता छोड़ दिया।

परिवार की मान्यता के अनुसार, राजा ने बाद में देवी की पूजा के लिए कुछ जमीन भी दान में दी थी। इसी घटना को मुखर्जी बाड़ी की दुर्गापूजा के विस्तार से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इस प्रसंग की पुष्टि के लिए ऐतिहासिक अभिलेखों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है।

नवमी पर महिष बलि, पहले दी जाती थीं दो भैंसों की बलि

मुखर्जी बाड़ी की दुर्गापूजा में नवमी का दिन विशेष महत्व रखता है। परिवार के अनुसार, पहले इस दिन दो भैंसों की बलि दी जाती थी, लेकिन बाद में यह परंपरा बदलकर एक भैंस की बलि तक सीमित हो गई।

परिवार में प्रचलित कहानी के मुताबिक, एक वर्ष नवमी से ठीक पहले एक भैंस के गले में रस्सी का फंदा फंसने से उसकी मौत हो गई थी। इसके बाद से एक ही भैंस की बलि देने की परंपरा जारी रही।

परिवार के अनुसार, अंग्रेजी शासन के दौरान भी इस प्रथा को रोकने का प्रयास किया गया था। बताया जाता है कि तत्कालीन अधिकारियों ने प्रशासन के माध्यम से इस परंपरा को बंद कराने की कोशिश की थी। परिवार में यह कहानी भी प्रचलित है कि एक अंग्रेज जिलाधिकारी के हस्तक्षेप के बाद यह प्रयास रोक दिया गया।

इस प्रसंग में जिलाधिकारी के कथित बुरे सपनों और उनकी तबीयत बिगड़ने की कहानी भी सुनाई जाती है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

षष्ठी से नवमी तक निभाई जाती हैं पुरानी रस्में

मुखर्जी बाड़ी में षष्ठी की शाम से पूजा-अर्चना शुरू होती है। इसके बाद सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक विभिन्न पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

परिवार के अनुसार, सप्तमी पर बेली वरण, डोला लाने, बकरे की बलि और कुमारी पूजा जैसी रस्में निभाई जाती हैं। अष्टमी पर भी निर्धारित परंपरा के अनुसार बकरे की बलि दी जाती है। नवमी को महिष बलि के साथ भेड़, गन्ने और चाल कुम्हड़े की बलि जैसी रस्में भी निभाई जाती हैं।

पूजा के चारों दिन मां दुर्गा को भोग और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। परिवार के सदस्य इन अनुष्ठानों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते हैं और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

चार दिनों के लिए एकजुट होता है पूरा परिवार

मुखर्जी बाड़ी की दुर्गापूजा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह परिवार के सदस्यों को एक साथ लाने का भी अवसर है। परिवार के अनुसार, सदस्य वर्षभर अलग-अलग स्थानों पर रहते हैं, लेकिन दुर्गापूजा के अवसर पर अपने पैतृक घर पहुंचने का प्रयास करते हैं।

इन चार दिनों में परिवार की महिलाएं भी पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। परिवार में नर-नारायण सेवा का आयोजन भी किया जाता है, जिसके तहत लोगों को भोजन कराया जाता है।

कभी मुखर्जी बाड़ी के मुख्य दरवाजे के ऊपर स्थित नौबतखाने से वाद्ययंत्रों की ध्वनि गूंजती थी। समय के साथ भवन और आसपास के वातावरण में बदलाव आया है, लेकिन परिवार के लिए यह पुराना घर आज भी अपनी विरासत का प्रतीक है।

आस्था, इतिहास और विरासत का संगम

सोंवाई गांव की मुखर्जी बाड़ी की दुर्गापूजा 334 वर्षों की पारिवारिक परंपरा, स्थानीय मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। पीढ़ियां बदलने के बावजूद परिवार ने अपने धार्मिक अनुष्ठानों को जारी रखा है।

नवमी की महिष बलि इस पूजा की विशिष्ट पहचान बनी हुई है, जबकि बर्दवान के राजा और अंग्रेजी शासन से जुड़े प्रसंग इसकी ऐतिहासिक कहानियों को और रोचक बनाते हैं। इन कहानियों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि भले ही आवश्यक हो, लेकिन परिवार की स्मृतियों में इनका विशेष स्थान है।

सोंवाई की मुखर्जी बाड़ी में दुर्गापूजा की यह परंपरा बताती है कि किसी परिवार की सांस्कृतिक विरासत केवल पुराने भवनों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपराओं और साझा स्मृतियों में भी जीवित रहती है।


 

  

        

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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