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महासप्तमी 2026: 17 अक्टूबर को होगी माँ कालरात्रि की पूजा, जानें नवपत्रिका स्नान और पूजा का शुभ मुहूर्त – पंडित हेमंत मिश्रा

शिल्पांचल टुडे, आसनसोल।

शारदीय नवरात्रि का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन महासप्तमी इस बार शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य पंडित हेमंत मिश्रा (MAJY) ने बताया कि इस दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है और इसी दिन से पंडालों में पूजा का उल्लास चरम पर पहुंच जाता है।
इस बार सप्तमी तिथि की स्थिति (दो दिनों तक विस्तार)
पंचांग की गणना के अनुसार, इस वर्ष सप्तमी तिथि का विस्तार दो दिनों (शनिवार, 17 अक्टूबर और रविवार, 18 अक्टूबर की सुबह तक) में हो रहा है:

मुख्य सप्तमी पूजा: चूंकि उदया तिथि (सूर्योदय के समय रहने वाली तिथि) का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, इसलिए मुख्य रूप से सप्तमी का व्रत और महासप्तमी की पूजा 17 अक्टूबर को ही मान्य और उत्तम मानी गई है।

तिथि का समापन: सप्तमी तिथि 17 अक्टूबर को पूरे दिन-रात रहने के बाद 18 अक्टूबर की सुबह (लगभग 8:29 बजे) तक विद्यमान रहेगी, जिसके बाद अष्टमी तिथि का आरंभ होगा। तिथि के इस तरह दो दिनों को स्पर्श करने के कारण कई जगहों पर लोग इसके समय को लेकर चर्चा करते हैं, लेकिन मुख्य अनुष्ठान और व्रत पहला सूर्योदय मिलने के कारण 17 अक्टूबर को ही किए जाएंगे।
महासप्तमी का विधि-विधान और प्रमुख परंपराएं
सप्तमी के दिन माँ दुर्गा की आराधना के लिए विशेष विधान और अनुष्ठान किए जाते हैं, जिनका विवरण नीचे दिया गया है:

नवपत्रिका पूजन (कला बोउ स्नान):
सप्तमी की सुबह का सबसे मुख्य अनुष्ठान ‘नवपत्रिका प्रवेश’ है। इसमें नौ प्रकार के विशेष पौधों (जैसे केला, कर्चूर, हल्दी, जयन्ती, बेल, अशोक, मान, दारुहल्दी और धान) को मिलाकर ‘नवपत्रिका’ बनाई जाती है। इसे नदी या पवित्र जल में ले जाकर महास्नान कराया जाता है और फिर माँ दुर्गा के दाहिने ओर स्थापित किया जाता है।

चक्षु मिलन और पट खुलना:
इस दिन पंडालों में माँ दुर्गा की प्रतिमा के नेत्र खोले जाते हैं, जिसे चक्षु मिलन कहा जाता है। इसके साथ ही आम भक्तों के लिए पूजा पंडालों के कपाट (पट) पूरी तरह से खोल दिए जाते हैं।

माँ कालरात्रि की षोडशोपचार पूजा:

स्नान व वस्त्र: प्रातःकाल स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनकर माता का ध्यान करें।
भोग: माँ कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयों का नैवेद्य अत्यंत प्रिय है, इसलिए भोग में गुड़ जरूर शामिल करें।
पुष्प व श्रृंगार: माता को लाल रंग के पुष्प (विशेषकर गुड़हल या रातरानी के फूल) अर्पित करें। सिंदूर, रोली और अक्षत से पूजा करें।
मंत्र जाप:
पूजा के दौरान माँ कालरात्रि के इस बीज मंत्र या स्तुति का जाप करना चाहिए:
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

संध्या आरती और धुनुची नृत्य:
सप्तमी की शाम को पंडालों और घरों में भव्य संध्या आरती होती है। इस दौरान ढाक की थाप और धुनुची (धूप-कपूर जलाने का पात्र) के साथ पारंपरिक नृत्य करने की भी विशेष परंपरा है, जो इस दिन के उत्सव को और भी अलौकिक बना देती है।
यदि आपके यहाँ स्थानीय पंचांग या पारिवारिक परंपरा के अनुसार नियमों में कोई भिन्नता है, तो आप अपने स्थानीय पुरोहित के मार्गदर्शन का पालन कर सकते हैं। माँ कालरात्रि की कृपा से आपके जीवन के सभी कष्ट और भय दूर हों!

पंडित हेमंत मिश्रा
ज्योतिषाचार्य (MAJY)
❤️ जय बजरंगबली 🙏🏿
Mb 9332449502

 

 

  

        

 

 

 

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