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जनता का गुस्सा और जवाबदेही का आईना: बंगाल की सियासत के लिए आत्ममंथन का वक्त

कुल्टी। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जो सबसे मुखर स्वर सुनाई दे रहा है, वह है जनता का गुस्सा। सड़कों पर विरोध प्रदर्शन, नेताओं के खिलाफ नारेबाजी और भ्रष्टाचार के आरोप अब अपवाद नहीं, बल्कि एक पैटर्न बनते जा रहे हैं। यह असंतोष महज सियासी विरोध नहीं है। यह उस टूटते भरोसे की आहट है जो जनता और जनप्रतिनिधि के बीच होना चाहिए।

सेवा का वादा बनाम हकीकत का फासला
राजनीति का मूलमंत्र सेवा और विकास है। लेकिन जब आम आदमी को लगे कि उसकी बुनियादी समस्याएं अनसुनी हैं, सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर नहीं उतर रहीं, और सत्ता का इस्तेमाल जनहित के बजाय निजी स्वार्थ के लिए हो रहा है, तब गुस्सा फूटना लाजिमी है।
हाल में कई जनप्रतिनिधियों पर सरकारी और राहत सामग्री को लेकर लगे आरोपों ने आग में घी का काम किया है। जांच एजेंसियों की कार्रवाई जारी है और दोषी कौन है, इसका फैसला अदालत करेगी। न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान जरूरी है। किसी को भी पहले से दोषी ठहराना लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है। लेकिन यह भी सच है कि आरोप भर से ही जनता का विश्वास डगमगाने लगता है। लोकतंत्र में विश्वास ही सबसे बड़ी पूंजी है।

जवाबदेही से ही बचेगा लोकतंत्र
सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह वक्त आत्ममंथन का है। भ्रष्टाचार, दबाव, धमकी या सियासी हिंसा के हर आरोप को गंभीरता से लेना होगा। पारदर्शिता दिखावे की नहीं, आचरण की होनी चाहिए।

बंगाल की जनता आज मुखर है। वह डर नहीं रही, सवाल पूछ रही है। यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। उसका संदेश साफ है: हमें विकास चाहिए, सुरक्षा चाहिए, पारदर्शिता चाहिए और सबसे बढ़कर जवाबदेही चाहिए।

सत्ता नहीं, विश्वास स्थायी होता है
हर दल को याद रखना होगा कि कुर्सी अस्थायी है, लेकिन जनता का सम्मान स्थायी पूंजी है। लोकतंत्र में आखिरी फैसला जनता की अदालत में होता है। जो आज गुस्से में नारेबाजी कर रही है, वही कल वोट से जवाब देगी।

बंगाल की सियासत के लिए यह गुस्सा एक चेतावनी भी है और मौका भी। चेतावनी इस बात की कि अनदेखी अब नहीं चलेगी। मौका इस बात का कि जवाबदेही और संवेदनशीलता दिखाकर टूटा हुआ भरोसा फिर से जीता जा सकता है। सवाल सिर्फ इतना है: क्या सत्ता के गलियारे इस आवाज को सुनने को तैयार हैं?

 

  

        

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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