उत्तर बंगाल में 30 साल बाद बाघों की दहाड़, बक्सा टाइगर रिजर्व में रचा गया इतिहास, वाल्मीकि से आई बाघिन का हुआ भव्य स्वागत
शिल्पांचल टुडे, अलीपुरद्वार।
पश्चिम बंगाल के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। उत्तर बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में तीन दशक बाद फिर से बाघों की वापसी की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य के पहले बाघ पुनर्वास कार्यक्रम के तहत बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई तीन वर्षीय रॉयल बंगाल बाघिन को विशेष प्राकृतिक बाड़े में छोड़ा गया।
इस ऐतिहासिक मौके पर राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री भूपेंद्र यादव विशेष रूप से उपस्थित रहे और इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का शुभारंभ किया।
पहले दिन किया आराम, जलाशय में लगाई डुबकी
लंबी यात्रा तय करके बक्सा पहुंचने के बाद पहले दिन बाघिन को आराम दिया गया। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि डुआर्स के गर्म और नम मौसम के बीच बाघिन ने बाड़े में बने प्राकृतिक जलाशय में स्नान भी किया, जो इस बात का संकेत है कि वह धीरे-धीरे यहां के माहौल में ढल रही है।
कैमरों से हो रही पल-पल की निगरानी
वन विभाग ने बाड़े के चारों ओर हाई-टेक ट्रैप कैमरे लगाए हैं, जिनसे बाघिन की हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। शुरुआती फुटेज में उसकी गतिविधियां पूरी तरह सामान्य पाई गई हैं।
सीधे जंगल में नहीं, पहले ‘सॉफ्ट रिलीज’
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, बाघिन को सीधे खुले जंगल में नहीं छोड़ा जाएगा। प्रोटोकॉल के तहत उसे पहले मानवीय संपर्क से दूर, प्राकृतिक वातावरण वाले एक बड़े विशेष बाड़े में रखा गया है। यहां उसकी सेहत, शिकार करने की क्षमता और जंगल में खुद को ढालने की प्रक्रिया की बारीकी से निगरानी की जाएगी।
सब कुछ सामान्य रहने पर ही उसे पूरी तरह से बक्सा के खुले जंगल में छोड़ा जाएगा।
वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि बक्सा टाइगर रिजर्व में शुरू हुई यह पहल न सिर्फ बाघों के संरक्षण बल्कि पूरे उत्तर बंगाल के इको-सिस्टम को फिर से जीवंत करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी।














