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सनसनीखेज खुलासा: अकबर के सेनापति मानसिंह की सेना ने बसाया था आसनसोल! 400 साल पुरानी पांडुलिपि में छिपा है शहर के नाम और पहली दुर्गा पूजा का रहस्य, जानिए नकड़ी-रामकृष्ण राय की वीरगाथा

आसनसोल – जहाँ कोयले से हीरे तक का सफर है, उसकी जड़ में भक्ति और शौर्य की कहानी

शिल्पांचल टुडे, आसनसोल।
जिसे आज पूरी दुनिया Black Diamond City और औद्योगिक राजधानी के नाम से जानती है, उस आसनसोल की नींव किसी फैक्ट्री से नहीं, बल्कि दो राजपूत वीरों की तलवार और माँ दुर्गा की भक्ति से पड़ी थी। हाल ही में मिली 400 साल पुरानी एक दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपि “आसनसोल ग्रामेर दुर्गा पूजेर उद्भव प्रसंगे” ने शहर के इतिहास के सारे पन्ने ही पलट दिए हैं।

अब तक लोग समझते थे कि आसनसोल अंग्रेजों का बसाया शहर है, लेकिन इस पांडुलिपि ने साबित कर दिया है कि इसका इतिहास मुगल सम्राट अकबर के काल से जुड़ा है और यह शहर राजपूताना शौर्य की निशानी है।

पढ़िए, कैसे एक घने जंगल से बना महानगर – पूरी कहानी फिल्मी अंदाज में

अंक 1 – अकबर और आमेर की दोस्ती जो बनी इतिहास की वजह

कहानी शुरू होती है साल 1562 से। दिल्ली के तख्त पर जलालुद्दीन अकबर का राज था। उसने राजपूतों से दोस्ती के लिए आमेर के कछवाहा वंशी राजा बिहारीमल की बेटी से शादी की। इस एक शादी ने भारत का इतिहास बदल दिया। राजा बिहारीमल के बेटे भगवान दास और पोते राजा मानसिंह अकबर के सबसे भरोसेमंद और सबसे खतरनाक सेनापति बन गए।

अकबर के बाद जब उसके बेटे सलीम ने बगावत की, तो मानसिंह ने अकबर के पोते खुसरो का साथ दिया। सलीम जब जहांगीर के नाम से बादशाह बना, तो उसने गुस्से में मानसिंह को राजधानी से दूर बंगाल भेज दिया। साल 1594 में राजा मानसिंह बंगाल के शासक बने।

मानसिंह अकेले नहीं आए। उनके साथ हजारों राजपूत योद्धा आए, जो अपनी तलवार के दम पर बंगाल में बस गए। 1592 से 1604 के बीच ये योद्धा बर्दवान के महाराजा और पंचकोट के राजा की सेना में भर्ती हो गए।

अंक 2 – जब दो वीरों को मिला आसन के जंगल का ठेका

समय आया साल 1740 का। बंगाल में नवाब अलीवर्दी खान का राज था और मराठा लुटेरे बंगाल को लूट रहे थे। उस समय पंचकोट के राजा थे गौर नारायण सिंह देव। उनका राज्य आज के आसनसोल के पूर्वी छोर तक था।

दामोदर नदी के उत्तर में एक ऐसा इलाका था जहाँ कोई नहीं जाता था। घना जंगल, जहरीले जानवर और हजारों आसन के पेड़। जमीन भी सोल यानी ऊसर। राजा को इस सरहद की रक्षा के लिए दो ऐसे वीर चाहिए थे जो मौत से न डरें।

राजा की नजर पड़ी अपने दो सबसे बहादुर घाटोवालों (सीमा रक्षकों) पर – नकड़ी राय और रामकृष्ण राय। दोनों सगे भाई, दोनों राजपूत, दोनों में वही खून जो मानसिंह के साथ बंगाल आया था।

राजा ने कहा – जाओ, इस जंगल को काटो और वहाँ अपनी छावनी बनाओ।

अंक 3 – और ऐसे पड़ा आसनसोल नाम

दोनों भाइयों ने अपनी तलवार से जंगल साफ किया। पेड़ काटे, जमीन समतल की, सेना छाउनी बनाई और खेती शुरू की। आसन के पेड़ों से घिरा और सोल जमीन पर बसा होने के कारण लोगों ने इस जगह को कहना शुरू किया – आसानसोल (आसन + सोल)। यही आसानसोल धीरे-धीरे बना आसनसोल।

अंक 4 – शहर से पहले शुरू हुई दुर्गा पूजा

जंगल में बस्ती बस गई, लेकिन वीरों को चिंता थी ग्राम की रक्षा की। क्षत्रिय होने के नाते वे माँ भवानी के भक्त थे। इसलिए ग्राम की सुख-समृद्धि के लिए उन्होंने सबसे पहले शिव मंदिर और काली मंदिर की स्थापना की, बाजार बसाया और फिर शुरू की अपने कुलदेवी माँ दुर्गा की पूजा। इस वर्ष 292 वां दुर्गापूजा हो रहा है।

पांडुलिपि स्पष्ट कहती है – यही पूजा आसनसोल की सबसे पहली और सबसे प्राचीन दुर्गा पूजा है। आज आसनसोल में 500 से ज्यादा पूजा होती हैं, लेकिन इन सबकी जननी वही पूजा है जो नकड़ी और रामकृष्ण ने शुरू की थी।

बाद में बर्दवान महाराजा ने इस ग्राम को आबाद करने के लिए ब्राह्मण, कायस्थ, तिली, मालीक, नापित, गोआला, बाउरी समेत कई जातियों को जमीन दी।

आज भी मौजूद है सबूत

स्थानीय लोगों का कहना है कि नकड़ी और रामकृष्ण द्वारा स्थापित प्राचीन शिव मंदिर आज भी आसनसोल ग्राम में मौजूद है। उनकी वंशावली आज भी खुद को ग्राम का संस्थापक मानती है।

तो अगली बार जब आप आसनसोल के चमचमाते मॉल और फैक्ट्रियों को देखें, तो याद रखिएगा – इस शहर की पहली ईंट किसी अंग्रेज ने नहीं, बल्कि दो राजपूत वीरों ने अपने खून-पसीने से रखी थी और पहली आरती माँ दुर्गा के नाम की हुई थी।

292 साल पुराना इतिहास और हिंदू एकता की मिसाल है आसनसोल ग्राम की दुर्गा पूजा – 1 नहीं, 9 दुर्गा मंदिर लेकिन विसर्जन एक साथ, रायर परिवार ने बताई एकजुटता की कहानी – सचिन राय
आसनसोल ग्राम की दुर्गा पूजा सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि 292 साल पुरानी एकता और भाईचारे की मिसाल है। यह बात स्थानीय निवासी, व्यवसायी एवं समाजसेवी सचिन राय ने बताई है।

उन्होंने बताया, “यहां 292 वर्ष पहले दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी। जैसे-जैसे राय परिवार का वंश बढ़ता गया, गांव का दायरा भी बढ़ा और एक-एक कर पूजाओं की संख्या बढ़कर नौ तक पहुंच गई। मंदिरों की संख्या जरूर अलग-अलग हो गई, लेकिन हम कभी अलग नहीं हुए।”

क्या है इस पूजा की सबसे बड़ी खासियत?

इस गांव की सबसे बड़ी खासियत है इसकी एकजुटता। गांव में बने 9 मंदिरों के नाम भी परिवार की तरह रखे गए हैं – बड़ो दुर्गा, मेजो दुर्गा, सेजो दुर्गा और छोटो दुर्गा।

षष्ठी-सप्तमी को नवपत्रिका लाने से लेकर विजयादशमी पर उसके विसर्जन तक के सभी बड़े अनुष्ठान एक साथ संपन्न होते हैं।

सचिदानंद राय ने बताया कि बड़ो दुर्गा मंदिर से लेकर सभी 9 मंदिरों के आयोजक एक कतार में अपने निजी ‘रामसायर तालाब’ पहुंचते हैं और वहां से नवपत्रिका लाते हैं। नवपत्रिका का विसर्जन व महिलाओं का सिंदूर खेला भी एकजुटता और सामूहिक सौहार्द के साथ आयोजित किया जाता है।

यानी मंदिर 9 हैं, पूजा 9 जगह होती है, लेकिन परंपरा, तालाब, नवपत्रिका और सिंदूर खेला सब एक है। यही वजह है कि 292 साल बाद भी यह पूजा पूरे आसनसोल में एकता की सबसे बड़ी मिसाल बनी हुई है।

 

  

        

 

 

 

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