नवरात्रि प्रथम दिवस: माँ शैलपुत्री की पूजा, स्वरूप, महत्व और पौराणिक कथा – जानिए ज्योतिषाचार्य पंडित हेमंत मिश्रा से
शिल्पांचल टुडे, आसनसोल।
नवरात्रि के प्रथम दिन माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। आइए, इनके स्वरूप, महत्व और पौराणिक कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं:
माँ शैलपुत्री का स्वरूप और परिचय
– पर्वतराज हिमालय की पुत्री: शैलराज हिमालय के यहाँ पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। इन्हें पार्वती और हेमवती के नाम से भी जाना जाता है।
– वाहन: माँ शैलपुत्री का वाहन वृषभ (बैल) है, इसलिए इन्हें ‘वृषारूणा’ भी कहा जाता है।
– रूप सज्जा: इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में शोभायमान कमल का पुष्प रहता है। ये अपने इस दिव्य रूप में सभी जीवों पर करुणा और कृपा बरसाती हैं।
धार्मिक महत्व एवं महिमा
– मूल आधार चक्र: योग साधना में माँ शैलपुत्री को मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। यहीं से योगियों की योग साधना का आरंभ होता है।
– स्थिरता और दृढ़ता: पर्वतराज की पुत्री होने के कारण ये दृढ़ता, स्थिरता और अचल विश्वास का प्रतीक हैं। इनकी उपासना करने से जीवन में धैर्य और साहस की प्राप्ति होती है।
पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या थीं और इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया, जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा।
पिता के यहाँ यज्ञ हो रहा है, यह जानकर माता सती वहाँ जाने के लिए विचलित हो उड़ीं। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि बिना आमंत्रण के जाना उचित नहीं है, परंतु सती के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने जाने की अनुमति दे दी। वहाँ पहुँचकर सती ने देखा कि किसी ने भी उनसे आदर से बात नहीं की और उनके पिता दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया। इस अपमान से व्यथित होकर माता सती ने उसी यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
अगले जन्म में उन्होंने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और इस बार पुनः भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में प्राप्त किया।
प्रथम दिन की पूजा विधि
– घटस्थापना (कलश स्थापना): नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना की जाती है, जिसके साथ ही नौ दिनों का अनुष्ठान शुरू होता है।
– पूजा सामग्री: माँ शैलपुत्री को सफेद रंग अतिप्रिय है, इसलिए इस दिन सफेद वस्त्र पहनना और माँ को सफेद फूल, गाय के घी से बने पकवान या सफेद मिठाइयों का भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है।
– मंत्र:
वंदे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
पंडित हेमंत मिश्रा
ज्योतिषाचार्य MAJY
❤️जय बजरंगबली 🙏🏻
Mb 9332449502














