Gen Z – स्क्रीन की दुनिया में उलझी पीढ़ी या भारत के भविष्य की सबसे बड़ी ताकत?
आकाश सिंह,
शिल्पांचल टुडे, कुल्टी।
कुल्टी। आज की दुनिया में एक पीढ़ी ऐसी है, जिसने बचपन से ही इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। इसे हम Gen Z यानी जेनरेशन ज़ी कहते हैं। आम तौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं को इस पीढ़ी में रखा जाता है।
Gen Z को केवल एक उम्र के समूह के रूप में देखना बड़ी भूल होगी। यह ऐसी पीढ़ी है जिसने दुनिया को देखने, सोचने, काम करने और अपनी बात रखने के तरीके को तेजी से बदला है।
आज का युवा किसी घटना की जानकारी के लिए सिर्फ अखबार या टेलीविजन का इंतजार नहीं करता। उसके हाथ में स्मार्टफोन है और कुछ सेकंड में वह देश-दुनिया की खबरों तक पहुंच सकता है। सोशल मीडिया ने उसे केवल दर्शक नहीं, बल्कि कंटेंट क्रिएटर और सूचना प्रसारक भी बना दिया है।
लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा होता है – क्या हर जानकारी सही है?
Gen Z की सबसे बड़ी ताकत उसकी तेजी है, लेकिन यही तेजी उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती है। बिना पूरी जानकारी के किसी वीडियो को शेयर करना, वायरल पोस्ट को सच मान लेना, ट्रेंड के पीछे चलना और लाइक्स-कमेंट्स को सामाजिक स्वीकार्यता समझ लेना समाज के लिए गंभीर चुनौती है।
आज युवाओं के सामने एक और समस्या है – तुलना की मानसिकता। सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति अपनी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा दिखाता है। नतीजा यह होता है कि दूसरा व्यक्ति अपनी वास्तविक जिंदगी की तुलना किसी और की डिजिटल जिंदगी से करने लगता है। इससे असंतोष, तनाव और अकेलेपन की भावना बढ़ सकती है।
फिर भी Gen Z को केवल आलोचना की नजर से देखना उचित नहीं होगा। यही पीढ़ी नई तकनीक को सबसे तेजी से सीख रही है। डिजिटल बिजनेस, स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, ऑनलाइन शिक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नए रोजगार के क्षेत्रों में युवा अपनी जगह बना रहे हैं।
इस पीढ़ी में करियर के साथ अपनी पहचान बनाने की इच्छा भी मजबूत है। युवा अब केवल नौकरी पाने की सोच तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह अपना ब्रांड बनाना चाहता है, अपनी आवाज को दुनिया तक पहुंचाना चाहता है।
लेकिन स्वतंत्र सोच और जिम्मेदारी एक साथ चलनी चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन सवाल के साथ तथ्य भी जरूरी हैं। अभिव्यक्ति की आजादी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
Gen Z के सामने आज असली चुनौती यह नहीं है कि उसके पास कितनी तकनीक है। चुनौती यह है कि वह तकनीक का इस्तेमाल किस उद्देश्य से करता है। मोबाइल ज्ञान का माध्यम भी बन सकता है और समय बर्बाद करने का साधन भी।
इसलिए Gen Z को रोकने की नहीं, दिशा देने की जरूरत है। माता-पिता को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि बच्चा फोन पर कितना समय बिताता है। उन्हें यह भी समझना होगा कि वह फोन पर क्या सीख रहा है। शिक्षण संस्थानों को भी डिजिटल साक्षरता के साथ फैक्ट-चेकिंग और साइबर सुरक्षा सिखाना होगा।
सवाल यह नहीं कि Gen Z कैसी है। सवाल यह है कि समाज Gen Z को कैसी दिशा दे रहा है।














